CTC का मतलब
CTC यानी cost to company (कॉस्ट टू कंपनी)। यह वह कुल रकम है जो आपकी कंपनी एक साल में आप पर ख़र्च करने की योजना बनाती है। इसमें आपकी सैलरी तो है ही, साथ में वह पैसा भी है जो कंपनी आपकी तरफ़ से जमा करती है, पर जो हर महीने आपके बैंक खाते में नहीं आता।
इसके दो आम उदाहरण हैं: कंपनी का PF योगदान (PF यानी Provident Fund, रिटायरमेंट के लिए बचत का खाता) और ग्रेच्युटी का प्रावधान (ग्रेच्युटी यानी तय सालों की नौकरी के बाद छोड़ने पर मिलने वाली एकमुश्त रकम)। यानी CTC कंपनी के बजट का आँकड़ा है, आपकी महीने की सैलरी नहीं।
₹9 लाख का CTC, हर लाइन के साथ
मीरा, 26 साल, दिल्ली में काम करती है। उसके ऑफ़र लेटर में लिखा है: “CTC ₹9,00,000 per annum” (सालाना)। हम मान रहे हैं कि उसकी बेसिक सैलरी ₹30,000 महीना है और HRA (मकान किराया भत्ता) बेसिक का आधा है। PF उसकी पूरी बेसिक का 12% है, और ग्रेच्युटी का प्रावधान CTC के अंदर है। कोई वेरिएबल पे नहीं है। टैक्स Tax Year 2026–27 की नई टैक्स व्यवस्था के हिसाब से है। मीरा काल्पनिक है; यह कोई असली ऑफ़र नहीं।
| हर महीने | ₹ |
|---|---|
| CTC (₹9,00,000 ÷ 12) | 75,000 |
| − कंपनी का PF (बेसिक का 12%) | 3,600 |
| − ग्रेच्युटी प्रावधान | 1,442 |
| = ग्रॉस सैलरी | 69,958 |
| − मीरा का अपना PF (बेसिक का 12%) | 3,600 |
| − प्रोफ़ेशनल टैक्स (दिल्ली में नहीं) | 0 |
| − TDS (सैलरी से कटने वाला इनकम टैक्स) | 0 |
| = टेक-होम | 66,358 |
साल भर में मीरा के हाथ ₹7,96,296 आते हैं। यह उसके CTC का लगभग 88% है। बाकी ₹1,03,704 में PF के दो हिस्से (हर एक ₹43,200) और ₹17,304 का ग्रेच्युटी प्रावधान है।
टैक्स क्यों नहीं? उसकी सालाना ग्रॉस सैलरी ₹8,39,496 है। ₹75,000 का स्टैंडर्ड डिडक्शन (नौकरीपेशा लोगों के लिए पहले घटाई जाने वाली तय रकम) घटाने के बाद टैक्स योग्य आय ₹7,64,496 बचती है। नई व्यवस्था में ₹12 लाख तक टैक्स योग्य आय वाले भारतीय निवासी को रिबेट मिलता है, जिससे पूरा टैक्स ख़त्म हो जाता है।
PF का पैसा उसकी रिटायरमेंट बचत में ही जाता है, बस इस महीने ख़र्च नहीं हो सकता। हर लाइन का पूरा हिसाब, प्रोफ़ेशनल टैक्स समेत, हमारी गाइड CTC, ग्रॉस और टेक-होम में है।
CTC कहाँ दिखता है
CTC आपको ऑफ़र लेटर में, अपॉइंटमेंट लेटर के साथ लगे सैलरी ब्रेकअप में और जॉब पोर्टल पर दिखेगा। भर्ती करने वाले इसे इसलिए बताते हैं क्योंकि यह सबसे बड़ी संख्या होती है। कई सैलरी स्लिप में CTC होता ही नहीं। उनमें ग्रॉस कमाई, कटौतियाँ और नेट पे होता है। Form 16 (कंपनी से मिलने वाला सालाना TDS सर्टिफ़िकेट) में सैलरी और टैक्स होता है, CTC नहीं।
CTC क्या नहीं है
- CTC ÷ 12 आपकी महीने की सैलरी नहीं है। मीरा के मामले में यह फ़र्क हर महीने ₹8,600 से ज़्यादा है।
- इसमें वेरिएबल पे हो सकता है। अगर मीरा के CTC में ₹60,000 सालाना बोनस होता, तो उसका महीने का टेक-होम घटकर ₹61,358 रह जाता। और बोनस पूरा न मिले, ऐसा भी हो सकता है।
- कुछ कंपनियाँ इंश्योरेंस प्रीमियम, मील कार्ड या जॉइनिंग बोनस भी जोड़ देती हैं। एक जैसे CTC वाले दो ऑफ़र में महीने की सैलरी काफ़ी अलग हो सकती है।
- यह आपकी टैक्स योग्य आय नहीं है। टैक्स ग्रॉस सैलरी से, स्टैंडर्ड डिडक्शन घटाकर, शुरू होता है।
ऑफ़र में क्या जाँचें
- HR से तय मासिक ग्रॉस और अनुमानित टेक-होम पूछें।
- पता करें कि कौन-से हिस्से वेरिएबल हैं और कब मिलते हैं।
- देखें कि कंपनी का PF और ग्रेच्युटी CTC के अंदर गिने गए हैं या नहीं।
- पूछें कि PF आपकी पूरी बेसिक पर गिना जाता है या नहीं।
एक बात और। नए लेबर कोड (21 नवंबर 2025 से लागू) के तहत, अगर भत्ते आपकी सैलरी के 50% से ज़्यादा हैं, तो उनका एक हिस्सा PF और ग्रेच्युटी के लिए “वेतन” (wages) में वापस जोड़ा जाता है। इससे कुछ पैसा टेक-होम से PF में जा सकता है।
अपना ऑफ़र हिस्सों में बाँटकर देखने के लिए सैलरी कैलकुलेटर आज़माएँ। आपके आँकड़े आपके डिवाइस पर ही रहते हैं।